कोलकाता – स्टाफ संवाददाता
जीवन केवल दो दिनों का है, लेकिन यदि कर्म अच्छे हों, तो उनका फल जन्म-जन्मांतर तक बना रहता है। दान-ध्यान का अर्थ दान-पुण्य, परोपकार तथा ईश्वर की उपासना और धार्मिक कार्यों का समन्वय है। दान देने से धन कम नहीं होता, बल्कि अनेक गुना बढ़ता है। जब हम लोगों के साथ खड़े होते हैं, उनके दुःख-दर्द, विपत्ति और रोगों को दूर करने का प्रयास करते हैं, तब मन को अपार शांति मिलती है तथा परलोक के लिए पुण्य या सवाब की प्राप्ति होती है। इससे समाज के गरीब और जरूरतमंद लोगों का कष्ट कम होता है तथा लोगों के बीच प्रेम, सहानुभूति और सौहार्द का वातावरण बनता है।
इसीलिए जो लोग दूसरों के आँसू, दुःख और संकट के समय निस्वार्थ भाव से, बिना किसी प्रचार के सेवा करते रहते हैं, वे वास्तव में ईश्वर के सच्चे सेवक हैं। दान अर्थात डोनेशन के माध्यम से जो सामाजिक कार्य किए जाते हैं, वही सेवा कहलाते हैं। ‘सेवा’ शब्द के भीतर त्याग, ममता, करुणा, भक्ति और मानव कल्याण के प्रति एक गहरा संकल्प छिपा हुआ है। सेवा एक ऐसा महान कार्य है, जिसका मुख्य उद्देश्य असहाय, गरीब, बीमार, दिव्यांग और वंचित लोगों के साथ खड़ा होना है। किसी प्रतिफल की इच्छा के बिना, केवल मानवता की पुकार पर कुछ लोग अपना पूरा जीवन समाज के कल्याण के लिए समर्पित कर देते हैं।
ऐसे ही ये दो परिवार अपने मानवीय संस्कारों, पारिवारिक शिक्षा और महापुरुषों के आदर्शों को हृदय में धारण कर मानव सेवा को अपने जीवन का व्रत बना चुके हैं। हर मौसम में, चौबीसों घंटे, सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक वे निरंतर लोगों की सेवा में लगे रहते हैं। कभी ऑक्सीजन, कभी भोजन, कभी वस्त्र, चावल, दाल, सब्ज़ियाँ, फल, पीने का पानी, दवाइयाँ—जिस किसी चीज़ की आवश्यकता होती है, वे निस्वार्थ भाव से उसे उपलब्ध कराने का प्रयास करते हैं। इस सेवा में उन्हें एक अद्भुत आनंद और आत्मसंतोष मिलता है, जिसे धन या प्रसिद्धि से कभी नहीं खरीदा जा सकता।
कबीर प्रसाद, जिन्होंने अपने दादा रामचंद्र प्रसाद, पिता रवीन्द्र प्रसाद और माता शिवानी प्रसाद के आदर्शों और आशीर्वाद को अपना मार्गदर्शक बनाकर स्वयं को मानव सेवा के लिए समर्पित कर दिया है। उनका परिवार कांकिनारा, भाटपाड़ा, उत्तर 24 परगना, पश्चिम बंगाल का निवासी है। पिन कोड – 743126। मानवता की सेवा में उनका यह निरंतर प्रयास आज अनेक लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुका है।
दूसरी ओर आशा सिंह, जिन्होंने अपने पिता शनत सिंह, माता रीता देवी तथा अपने पति दिलीप सिंह के साथ पूरे परिवार को मानव सेवा के कार्य में समर्पित कर दिया है। वे लोगों की विभिन्न समस्याओं में उनके साथ खड़े होकर भोजन, वस्त्र, दवाइयाँ, पीने का पानी, पुस्तकें, कॉपियाँ, बच्चों की आवश्यक सामग्री तथा वृद्धाश्रम के लोगों की आवश्यक जरूरतें निरंतर उपलब्ध करा रहे हैं।
आशा सिंह और उनका परिवार झारखंड के बोकारो स्टील सिटी के निवासी हैं। उनका पता है— क्वार्टर नंबर 1330, स्ट्रीट नंबर 07, सेक्टर–8ए, बोकारो स्टील सिटी, झारखंड – 827009। पारिवारिक संस्कार, मानवीय शिक्षा और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों को सामने रखकर वे निरंतर मानवता की सेवा में लगे हुए हैं और समाज के लिए एक उज्ज्वल उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
उनकी यह महान पहल केवल असहाय लोगों के चेहरे पर मुस्कान ही नहीं लाती, बल्कि समाज के अनेक लोगों को भी प्रेरित करती है। स्वच्छ, जागरूक और जिम्मेदार समाज के निर्माण के उद्देश्य से चलाए जा रहे माननीय प्रधानमंत्री के “स्वच्छ भारत अभियान” की भावना के साथ भी उनके इस मानवीय प्रयास का सुंदर सामंजस्य दिखाई देता है। क्योंकि एक स्वस्थ, सुंदर और मानवीय समाज तभी बनता है, जब मनुष्य मनुष्य के साथ खड़ा होता है।
मानवता आज भी जीवित है। जो लोग दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझकर आगे आते हैं, वही समाज की वास्तविक संपत्ति हैं। ऐसे लोगों की वजह से ही आज भी समाज में मानवता की ज्योति प्रज्वलित है।
समाज के इन मौन मानवसेवियों के प्रति हमारी ओर से गहरा सम्मान, हार्दिक प्रेम और अनंत शुभकामनाएँ। ईश्वर से प्रार्थना है कि वे आगे भी इसी प्रकार मानवता का दीप जलाए रखें, असहाय लोगों के जीवन में मुस्कान लाएँ और अनेक लोगों को सेवा के इस महान आदर्श से प्रेरित करते रहें।
क्योंकि ईश्वर मनुष्य के भीतर ही निवास करते हैं, और मानव सेवा ही ईश्वर सेवा की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।
