कोलकाता – स्टाफ संवाददाता
बदलती जीवनशैली, बढ़ते प्रदूषण और मौसम के बदलते मिज़ाज ने खांसी को भारतीय परिवारों के लिए स्वास्थ्य से जुड़ी सबसे आम समस्याओं में से एक बना दिया है। हालांकि हल्की या मध्यम खांसी का इलाज OTC (बिना डॉक्टर की पर्ची के मिलने वाली) दवाओं से किया जा सकता है, लेकिन आज के ग्राहक अपने चुने हुए उत्पादों को लेकर कहीं ज़्यादा जागरूक हो गए हैं।
यह जागरूकता हाल ही में सामने आई उन रिपोर्टों की वजह से बढ़ी है जिनमें खांसी की कुछ सिरप में डायथिलीन ग्लाइकोल (DEG) और एथिलीन ग्लाइकोल (EG) जैसे ज़हरीले इंडस्ट्रियल केमिकल पाए गए थे। ग्राहकों की सुरक्षा पर इस नए फ़ोकस को देखते हुए, भारत सरकार ने सिरप फ़ॉर्मूलेशन की रेगुलेटरी निगरानी को मज़बूत करने के लिए ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स नियमों में बदलाव किए हैं।
सुरक्षा और क्वालिटी पर बढ़ते इस फ़ोकस के कारण ज़्यादा ग्राहक खांसी के लिए आयुर्वेदिक उपाय चुन रहे हैं। जहां पारंपरिक खांसी की सिरप फ़ार्मास्युटिकल एक्टिव इंग्रीडिएंट्स (सक्रिय तत्वों) से बनाई जाती हैं, वहीं आयुर्वेदिक खांसी की सिरप तुलसी, मुलेठी, सोंठ और बनफ़्शा जैसी सदियों से आजमाई हुई औषधीय जड़ी-बूटियों से बनती हैं। इन चीज़ों का इस्तेमाल आयुर्वेद में पीढ़ियों से गले को आराम देने, सांस की सेहत को बेहतर बनाने और खांसी से राहत पाने के लिए किया जाता रहा है। आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययनों से साबित हुई इन प्राकृतिक हर्बल चीज़ों की जानकारी और भरोसे के कारण आयुर्वेदिक फ़ॉर्मूलेशन में ग्राहकों का भरोसा बढ़ रहा है।
जैसे-जैसे ग्राहकों की उम्मीदें बदल रही हैं, भरोसा, सुरक्षा और असरदार होने की वजह से आयुर्वेदिक फ़ॉर्मूलेशन की पसंद बढ़ रही है। इनमें पारंपरिक जड़ी-बूटियों के फ़ायदे और आधुनिक वैज्ञानिक रिसर्च का भरोसा दोनों शामिल होते हैं।
ग्राहकों को हमेशा भरोसेमंद जगहों से दवाएं खरीदनी चाहिए और उन्हें लेबल पर दिए गए निर्देशों के अनुसार या किसी रजिस्टर्ड डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही इस्तेमाल करना चाहिए।
यह लेख वैद्य सुजाता चौधरी ने लिखा है।
